Saturday, October 15, 2011

कोई मुझको मेरा पता दे दे..

वक़्त-ए-तन्हाई सोचता हूँ मैं
क्या है दुनिया ये और क्या हूँ मैं?

साँस लेने की अब कहाँ फुर्सत
हर घडी तुझको सोचता हूँ मैं

कोई मुझको मेरा पता दे दे
एक मुद्दत से ढूँढता हूँ मैं

याद आये तेरी तो याद आये
अब तुझे भूलने लगा हूँ मैं

तू है कि फिर भी हंसती रहती है
तुझको क्या-क्या न बोलता हूँ मैं?

ईश्क़ जीवन में गर ना रहा

ईश्क़ जीवन में गर ना रहा
समझो जीना भी मरना रहा

हो
गए जब किसी और के
तुम को खोने का डर ना रहा

हर
कहीं फिर ठिकाना हुआ
जब कहीं अपना घर ना रहा

मौत
उसको डराएगी क्या?
जिसका मकसद ही मरना रहा