कानों में आ रही है सदा नाद ब्रह्म की, या कि तेरी पाजेब ने झंकार किया है...
जब चला जाता है वो मेरे गाँव से
धुप लगती है मुझको घनी छाँव से
उसका चेहरा क्या होगा ज़रा सोचिये,
साफ करता है वो आईना पांव से.
तुमको कल छत पे जो नहीं पाए
चाँद तारे भी सो नहीं पाए
हमको मिलता कहाँ तेरा कांधा,
हम बिखर के भी रो नहीं पाए,