Thursday, December 9, 2010

नज़्म

सांवरे सांवरे सांवरे सांवरे
मन ये नाचे हो जैसे कोई पाँव रे

मेरे मासूम दिल को ठिकाना दिया
नाम तुने ही इसका दीवाना दिया
एक बेनाम को मिल गया नाँव रे
सांवरे .....................................

जिसकी माटी में खेले हुए हम जवां
प्यार के हमने बरसों बिताये जहां
याद वो फिर से आया मेरा गाँव रे
सांवरे .....................................

राग ने आज छेड़ा है वो रागिनी
रक्स में चाँद है और है चांदनी
दिल ने गया मेरे सांवरे सांवरे

मन ये नाचे हो जैसे कोई पाँव रे
सावरे.......................................

ग़ज़ल

बरस रही है हंसी आहिस्ता आहिस्ता
यूँ ही मिलेगी ख़ुशी आहिस्ता आहिस्ता
हर एक पल को इतिहास बनाते हुए,
बढरही है जिंदगी आहिस्ता आहिस्ता
शायद कि चढ़ रही है वो अपने छत पे,
बिखर रही है चांदनी आहिस्ता आहिस्ता
अब घर की दहलीज़ कभी रोकेगी नहीं,
फैलने लगी रौशनी आहिस्ता आहिस्ता
मुकम्मल अब हो जायेगा ये अधूरापन,
बोलने लगी है ख़ामोशी आहिस्ता आहिस्ता

Thursday, November 25, 2010

क़ता

परछाइयाँ उभरीं तो खुद से मुलाक़ात हो गयी
जब खुद से बिछड़ गया तो देखा रात हो गयी
आगे वाले को धक्का दे के आगे निकल गया,
उसकी बद्दुआ मगर मेरे साथ हो गयी!

Saturday, November 20, 2010

रुबाई

खामोश रहो तुम सुनो ये आवाज़

हैं फूट रहे मौन से ये अल्फाज़

नादान! कभी तो समझ मेरी बात,

जो नामे-खुदा है नफ़स में है राज़

संग भी देवता हो गया

सर झुकाते ये क्या हो गया
संग भी देवता हो गया
बस ज़रा देर चलने की थी,
दश्त में रास्ता हो गया
बिन दुआ माँ के निकला था वो,
राह में हादसा हो गया
मिट गयी जब खुदी भी मेरी,
दोस्तों! मैं खुदा हो गया
एक पल को नज़र क्या मिली,
दिल मेरा आपका हो गया
बज्मे -उल्फत में फिर आपसे,
आमना-सामना हो गया

Monday, November 15, 2010

रुबाई

इन्सान किसी याद से छूटे ही नहीं

ये बात अलग है कि वो जाने ही नहीं

जो बीत चुका है बुरा माजी मैं उसे,

चाहूं कि भुला दूँ मगर भूले ही नहीं!

अश्कबार मेरी आँखें

मैंने माना हो जाएँगी अश्कबार मेरी आँखें!

पर हकीक़त देखने को हैं तैयार मेरी आँखें!

उन्हें देखके भी न देखने का बहाना करती हैं,

लगता हैं हो गयीं हैं समझदार मेरी आँखें!
अब जिस्म ने पहन ली बुढ़ापे का पैरहन,

आईना देखने से करने लगीं इंकार मेरी आँखें!

जिसे देखके कौनेन अपना होश खो बैठे,

ऐसे हुस्न की हैं की परस्तार मेरी आँखें!

अश्कबार मेरी आँखें

Thursday, October 14, 2010

आईना

देखते अब नहीं आईना

हो गये हैं हमीं आईना !

जिसमे देखे है रूह आपको

है वो काया हसीं अईना !

आईना देखते हो तुम्ही

और हो भी तुम्ही आईना !

आ रहा है कोई बुद्ध फिर

हो रही है जमीं आईना !

मैं भी हूँ आईना अस्ल में

ये दिलाता यकीं आईना !

साफ़ है इसलिए कि कभी

कुछ भी रखता नहीं आईना !

जब कोई सामने हो तो हो

आईना फिर नहीं आईना !

देख लो राग तुम आपको

है तुम्हारा जबीं आईना !





Saturday, March 13, 2010

आईना पांव से

जब चला जाता है वो मेरे गाँव से

धुप लगती है मुझको घनी छाँव से

उसका चेहरा क्या होगा ज़रा सोचिये,

साफ करता है वो आईना पांव से.

Friday, March 12, 2010

रागरागिनी

तुमको कल छत पे जो नहीं पाए

चाँद तारे भी सो नहीं पाए

हमको मिलता कहाँ तेरा कांधा,

हम बिखर के भी रो नहीं पाए,