Thursday, November 25, 2010

क़ता

परछाइयाँ उभरीं तो खुद से मुलाक़ात हो गयी
जब खुद से बिछड़ गया तो देखा रात हो गयी
आगे वाले को धक्का दे के आगे निकल गया,
उसकी बद्दुआ मगर मेरे साथ हो गयी!

Saturday, November 20, 2010

रुबाई

खामोश रहो तुम सुनो ये आवाज़

हैं फूट रहे मौन से ये अल्फाज़

नादान! कभी तो समझ मेरी बात,

जो नामे-खुदा है नफ़स में है राज़

संग भी देवता हो गया

सर झुकाते ये क्या हो गया
संग भी देवता हो गया
बस ज़रा देर चलने की थी,
दश्त में रास्ता हो गया
बिन दुआ माँ के निकला था वो,
राह में हादसा हो गया
मिट गयी जब खुदी भी मेरी,
दोस्तों! मैं खुदा हो गया
एक पल को नज़र क्या मिली,
दिल मेरा आपका हो गया
बज्मे -उल्फत में फिर आपसे,
आमना-सामना हो गया

Monday, November 15, 2010

रुबाई

इन्सान किसी याद से छूटे ही नहीं

ये बात अलग है कि वो जाने ही नहीं

जो बीत चुका है बुरा माजी मैं उसे,

चाहूं कि भुला दूँ मगर भूले ही नहीं!

अश्कबार मेरी आँखें

मैंने माना हो जाएँगी अश्कबार मेरी आँखें!

पर हकीक़त देखने को हैं तैयार मेरी आँखें!

उन्हें देखके भी न देखने का बहाना करती हैं,

लगता हैं हो गयीं हैं समझदार मेरी आँखें!
अब जिस्म ने पहन ली बुढ़ापे का पैरहन,

आईना देखने से करने लगीं इंकार मेरी आँखें!

जिसे देखके कौनेन अपना होश खो बैठे,

ऐसे हुस्न की हैं की परस्तार मेरी आँखें!

अश्कबार मेरी आँखें