मैंने माना हो जाएँगी अश्कबार मेरी आँखें!
पर हकीक़त देखने को हैं तैयार मेरी आँखें!
उन्हें देखके भी न देखने का बहाना करती हैं,
लगता हैं हो गयीं हैं समझदार मेरी आँखें!
अब जिस्म ने पहन ली बुढ़ापे का पैरहन,
आईना देखने से करने लगीं इंकार मेरी आँखें!
जिसे देखके कौनेन अपना होश खो बैठे,
ऐसे हुस्न की हैं की परस्तार मेरी आँखें!
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